डिग्री नहीं, कौशल चाहिए : भारत की शिक्षा व्यवस्था युवाओं को आत्मनिर्भर बनाए केवल नौकरी का अभ्यर्थी नहीं

आचार्य अशोक चौधरी ‘प्रियदर्शी’
कटिहार, बिहार
भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाला देश बनने की ओर अग्रसर है। इसे देश की सबसे बड़ी पूंजी और भविष्य की शक्ति माना जाता है। किंतु विडंबना यह है कि जिस युवा शक्ति को भारत के विकास का आधार बनना चाहिए था, उसका एक बड़ा वर्ग आज रोजगार की तलाश में भटक रहा है। बेरोजगारी पर होने वाली चर्चाओं में एक तथ्य बार-बार सामने आता है कि बेरोजगारों में बड़ी संख्या उन युवाओं की है जिनके पास स्नातक, स्नातकोत्तर, इंजीनियरिंग, प्रबंधन अथवा अन्य उच्च शिक्षाओं की डिग्रियां हैं। इसके विपरीत यदि हम पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े लोगों—जैसे किसान, नाई, बढ़ई, प्लंबर, राजमिस्त्री, मोची, लोहार, कुम्हार, दर्जी, सुनार, बुनकर, बिजली मिस्त्री, वाहन मैकेनिक तथा अन्य शिल्पकारों—को देखें, तो उनमें पूर्ण बेरोजगारी अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। उनकी आय में उतार-चढ़ाव हो सकता है, आर्थिक चुनौतियां भी हो सकती हैं, लेकिन वे प्रायः किसी-न-किसी उत्पादक कार्य से जुड़े रहते हैं।
यह तुलना किसी पेशे को बड़ा या छोटा सिद्ध करने के लिए नहीं है, बल्कि इस प्रश्न को समझने के लिए है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं को जीवन के लिए तैयार कर रही है या केवल नौकरी की प्रतीक्षा करने वाला बना रही है।
भारतीय समाज की पारंपरिक व्यवस्था में परिवार केवल सामाजिक संस्था नहीं था, बल्कि कौशल का विद्यालय भी था। बढ़ई का बेटा लकड़ी का काम सीखता था, लोहार का पुत्र औजार बनाना, किसान खेती की बारीकियां, नाई अपने पेशे की तकनीक, राजमिस्त्री निर्माण कार्य, कुम्हार मिट्टी को आकार देना और मोची जूते बनाना व उनकी मरम्मत करना सीखता था। यह ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि अभ्यास और अनुभव से प्राप्त होता था। यही कारण था कि युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते व्यक्ति किसी-न-किसी कार्य में दक्ष हो जाता था और उसे जीविका के लिए केवल नौकरी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था।
समय बदला, शिक्षा का विस्तार हुआ, विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या बढ़ी। यह स्वागतयोग्य परिवर्तन था, क्योंकि शिक्षा समाज को आगे बढ़ाती है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ी भूल भी हुई। हमने डिग्री को कौशल से ऊपर रख दिया। धीरे-धीरे यह धारणा बन गई कि सफलता का अर्थ केवल सरकारी या सफेदपोश नौकरी है। परिणाम यह हुआ कि करोड़ों युवाओं ने वर्षों तक केवल परीक्षाएं पास करने और प्रमाणपत्र प्राप्त करने को ही शिक्षा का उद्देश्य मान लिया।
आज की शिक्षा व्यवस्था का एक बड़ा संकट यही है कि वह अनेक विद्यार्थियों को सैद्धांतिक ज्ञान तो देती है, लेकिन व्यावहारिक दक्षता पर्याप्त रूप से नहीं दे पाती। अनेक इंजीनियरिंग स्नातक जटिल तकनीकी सिद्धांत पढ़ते हैं, लेकिन अपने घर की साधारण विद्युत खराबी ठीक नहीं कर पाते। अनेक विज्ञान स्नातक प्रयोगशाला के बाहर सामान्य तकनीकी समस्याओं का समाधान नहीं कर पाते। सामान्य स्नातक डिग्री प्राप्त करने वाला युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है, लेकिन यदि नौकरी नहीं मिलती तो उसके पास आजीविका का दूसरा व्यावहारिक विकल्प नहीं होता।
यह स्थिति केवल विद्यार्थियों की नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा प्रणाली की चुनौती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि इंजीनियरिंग या विश्वविद्यालयी शिक्षा निरर्थक है। विज्ञान, चिकित्सा, अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और उच्च शिक्षा किसी भी विकसित राष्ट्र की आवश्यकता हैं। प्रश्न यह है कि क्या हमारी शिक्षा में सिद्धांत और व्यवहार का संतुलन है? क्या प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी डिग्री के साथ ऐसा कोई कौशल भी मिल रहा है, जिससे वह आवश्यकता पड़ने पर स्वयं रोजगार आरंभ कर सके?
आज भी भारत के गांवों और कस्बों में एक कुशल प्लंबर, बिजली मिस्त्री, बढ़ई, राजमिस्त्री, वाहन मैकेनिक या कृषि विशेषज्ञ को निरंतर काम मिलता है। अच्छे कारीगरों की मांग कई क्षेत्रों में उपलब्धता से अधिक है। दूसरी ओर लाखों शिक्षित युवा वर्षों तक केवल एक सरकारी नौकरी की प्रतीक्षा करते रहते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि समस्या केवल रोजगार की संख्या की नहीं, बल्कि रोजगार के प्रति हमारी सोच और शिक्षा की दिशा की भी है।
हमारे समाज में श्रम के प्रति दृष्टिकोण भी इस समस्या के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। हाथ से काम करने वाले व्यक्ति को लंबे समय तक अपेक्षित सामाजिक सम्मान नहीं मिला। परिवारों ने भी अपने बच्चों को यह समझाया कि किसी भी प्रकार से डिग्री प्राप्त करो और नौकरी तलाशो। परिणाम यह हुआ कि कौशल आधारित व्यवसायों में प्रशिक्षित लोगों की संख्या घटती गई, जबकि डिग्रीधारियों की संख्या तेजी से बढ़ती चली गई।
यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। देश को कुशल तकनीशियन चाहिए, प्रशिक्षित मशीन ऑपरेटर चाहिए, आधुनिक किसान चाहिए, खाद्य प्रसंस्करण विशेषज्ञ चाहिए, निर्माण क्षेत्र के दक्ष श्रमिक चाहिए, इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, फिटर, वेल्डर और डिजिटल तकनीक जानने वाले कारीगर चाहिए; लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा अभी भी विद्यार्थियों को मुख्यतः परीक्षाओं और प्रमाणपत्रों तक सीमित रखता है।
यहीं पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति और कौशल आधारित शिक्षा की आवश्यकता सबसे अधिक प्रासंगिक हो जाती है। पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा को अधिक रोजगारोन्मुखी बनाने, व्यावसायिक शिक्षा को विद्यालय स्तर से जोड़ने, इंटर्नशिप और कौशल विकास पर बल देने के प्रयास किए गए हैं। यह सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन केवल नीति बना देने से परिवर्तन नहीं आता। जब तक विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम स्थानीय अर्थव्यवस्था, उद्योगों और वास्तविक जीवन की आवश्यकताओं से नहीं जुड़ेंगे, तब तक डिग्री और रोजगार के बीच की दूरी बनी रहेगी।
विश्व के अनेक विकसित देशों ने शिक्षा को कौशल से जोड़ा है। जर्मनी का ‘ड्यूल वोकेशनल ट्रेनिंग सिस्टम’ हो या जापान में तकनीकी दक्षता पर बल, वहाँ विद्यार्थी पढ़ाई के साथ-साथ किसी न किसी व्यावहारिक कौशल में भी प्रशिक्षित होता है। परिणामस्वरूप उसके सामने केवल नौकरी खोजने का विकल्प नहीं होता, बल्कि वह स्वयं भी रोजगार सृजित करने की क्षमता रखता है। भारत जैसे विशाल देश में भी इस प्रकार के मॉडल को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया जा सकता है।
भारत में आईटीआई, पॉलिटेक्निक, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान, अप्रेंटिसशिप कार्यक्रम और कौशल विकास मिशन इसी दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास हैं। लेकिन दुर्भाग्य से समाज में अभी भी इनके प्रति वह सम्मान नहीं है जो सामान्य विश्वविद्यालयी डिग्री को मिलता है। अनेक अभिभावक अपने बच्चे को किसी भी प्रकार स्नातक बना देना चाहते हैं, परंतु उसे किसी तकनीकी या व्यावसायिक कौशल में प्रशिक्षित कराने को उतनी प्राथमिकता नहीं देते। यह मानसिकता भी बदलनी होगी।
हमें यह भी समझना होगा कि कृषि स्वयं एक अत्यंत जटिल और वैज्ञानिक पेशा बन चुकी है। आधुनिक किसान केवल हल चलाने वाला व्यक्ति नहीं है। उसे बीज, सिंचाई, उर्वरक, मौसम, ड्रोन तकनीक, कृषि मशीनरी, बाजार, भंडारण और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जानकारी भी रखनी पड़ती है। इसी प्रकार एक आधुनिक बढ़ई केवल लकड़ी काटने वाला कारीगर नहीं है; वह आधुनिक मशीनों, डिज़ाइन और इंटीरियर तकनीक से भी जुड़ सकता है। एक प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन या वाहन मैकेनिक यदि नई तकनीकों का प्रशिक्षण प्राप्त कर ले, तो उसकी आय कई गुना बढ़ सकती है। अर्थात पारंपरिक कौशल और आधुनिक तकनीक का समन्वय ही भविष्य का मार्ग है।
आज अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ कुशल प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, वेल्डर, मशीन ऑपरेटर, फर्नीचर निर्माता, मोबाइल रिपेयर तकनीशियन या कृषि उद्यमी की मासिक आय कई डिग्रीधारी युवाओं से अधिक है। इसका अर्थ यह नहीं कि शिक्षा का महत्व कम हो गया है, बल्कि यह कि शिक्षा तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति की उत्पादक क्षमता को बढ़ाए। केवल प्रमाणपत्र हाथ में होना और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होना शिक्षा की अधूरी सफलता को दर्शाता है।
इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। केवल यह कहना कि पारंपरिक पेशों में बेरोजगारी नहीं है, पूरी तस्वीर नहीं होगी। इन क्षेत्रों के सामने भी अनेक चुनौतियाँ हैं—पूंजी का अभाव, आधुनिक उपकरणों की कमी, सामाजिक सुरक्षा का अभाव, असंगठित श्रम, बाज़ार तक सीमित पहुँच और आय की अनिश्चितता। इसलिए आवश्यकता यह नहीं कि युवा केवल पारंपरिक व्यवसाय अपनाएँ, बल्कि यह है कि उन व्यवसायों को आधुनिक तकनीक, वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और बाज़ार से जोड़ा जाए ताकि वे अधिक सम्मानजनक और लाभकारी बन सकें।
आज भारत को “डिग्री आधारित अर्थव्यवस्था” से आगे बढ़कर “कौशल आधारित अर्थव्यवस्था” की ओर कदम बढ़ाना होगा। प्रत्येक विद्यार्थी चाहे वह कला, विज्ञान, वाणिज्य, इंजीनियरिंग या किसी अन्य विषय का छात्र हो, उसे अपनी औपचारिक शिक्षा के साथ कम-से-कम एक व्यावहारिक कौशल अवश्य सीखना चाहिए। यदि किसी कारणवश उसे इच्छित नौकरी न मिले, तो वह अपने कौशल के आधार पर सम्मानपूर्वक स्वरोजगार प्रारंभ कर सके। यही वास्तविक आत्मनिर्भरता है।
सरकारों की भी जिम्मेदारी है कि वे उद्योग, सेवा क्षेत्र, कृषि और लघु उद्यमों में पर्याप्त रोजगार के अवसर सृजित करें। लेकिन समाज और शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि विद्यालय केवल परीक्षा पास कराना और विश्वविद्यालय केवल डिग्री बाँटना अपना उद्देश्य मान लेंगे, तो बेरोजगारी का संकट कम नहीं होगा। शिक्षा का लक्ष्य व्यक्तित्व निर्माण, समस्या समाधान, नवाचार, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता होना चाहिए।
भारत की नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि कोई भी कार्य छोटा नहीं होता। श्रम का सम्मान ही विकसित समाज की पहचान है। जिस समाज में हाथ से काम करने वाले व्यक्ति को सम्मान मिलता है, वही समाज उत्पादन, नवाचार और आर्थिक प्रगति में आगे बढ़ता है। यदि एक इंजीनियर अपने तकनीकी ज्ञान के साथ व्यवहारिक दक्षता भी रखता हो, एक स्नातक डिजिटल सेवाएँ भी प्रदान कर सके, एक किसान आधुनिक कृषि विज्ञान भी समझता हो और एक पारंपरिक शिल्पकार आधुनिक बाजार से भी जुड़ा हो, तो भारत की मानव शक्ति कहीं अधिक उत्पादक बन सकती है।
अंततः भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता केवल विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसे शिक्षा तंत्र का निर्माण करना है जो ज्ञान और कौशल का संतुलित समन्वय स्थापित करे। डिग्री का मूल्य तभी है जब वह व्यक्ति को आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक आजीविका प्रदान करे। यदि शिक्षा केवल नौकरी की प्रतीक्षा करना सिखाती है, तो वह अधूरी शिक्षा है; यदि शिक्षा व्यक्ति को परिस्थितियों के अनुसार अवसर निर्माण करना सिखाती है, तो वही वास्तविक शिक्षा है।
भारत को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो नौकरी पाने की क्षमता भी रखें और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं रोजगार सृजित करने का साहस भी। यही आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक आधारशिला होगी। तभी डिग्री केवल दीवार पर टंगा प्रमाणपत्र नहीं रहेगी, बल्कि राष्ट्र निर्माण और आर्थिक समृद्धि का सशक्त माध्यम बनेगी।
लेखक परिचय:
राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं समसामयिक विषयों पर स्वतंत्र शोध लेखक, समीक्षक, विचारक, सामाजिक चिंतक।




