एफसीआरए पर संसदीय मंथन की कमान: डॉ संजय जायसवाल को, विदेशी अंशदान कानून में संतुलन, पारदर्शिता और जवाबदेही की नई चुनौती

आचार्य अशोक चौधरी प्रियदर्शी
कटिहार, बिहार
भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में विदेशी अंशदान का प्रश्न केवल वित्तीय प्रबंधन का विषय नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पारदर्शिता, नागरिक समाज की भूमिका और संवैधानिक स्वतंत्रताओं से भी जुड़ा हुआ है। इसी कारण विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) समय-समय पर सार्वजनिक और संसदीय विमर्श का विषय बनता रहा है। यदि इस कानून की समीक्षा या संभावित संशोधनों पर संसदीय स्तर पर विचार-विमर्श किया जा रहा है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है, क्योंकि किसी भी कानून की प्रभावशीलता का आकलन उसके व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर किया जाना चाहिए।
एफसीआरए का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी स्रोतों से प्राप्त धन का उपयोग भारत के विधि-सम्मत उद्देश्यों के अनुरूप हो तथा उसका दुरुपयोग ऐसी गतिविधियों में न हो जो राष्ट्रीय हित, सार्वजनिक व्यवस्था या लोकतांत्रिक संस्थाओं को प्रभावित कर सकें। दूसरी ओर, अनेक सामाजिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य और मानवीय सेवा से जुड़े संगठन यह भी कहते रहे हैं कि अनुपालन की प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और समयबद्ध होनी चाहिए, ताकि वैध जनकल्याणकारी कार्य अनावश्यक प्रशासनिक कठिनाइयों से प्रभावित न हों।
इसी संतुलन की तलाश किसी भी संसदीय समीक्षा का मूल उद्देश्य होनी चाहिए। संसदीय समितियों की विशेषता यह है कि वे केवल सरकारी दृष्टिकोण तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि विशेषज्ञों, प्रशासन, नागरिक समाज, विधि विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों के विचारों का अध्ययन कर संतुलित सुझाव देने का प्रयास करती हैं। किसी भी समिति के अध्यक्ष की भूमिका भी इसी प्रक्रिया को निष्पक्ष, व्यापक और तथ्याधारित ढंग से आगे बढ़ाने की होती है।
एफसीआरए पर समय-समय पर हुए संशोधनों ने यह स्पष्ट किया है कि सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन विदेशी अंशदान के नियमन की आवश्यकता पर व्यापक सहमति बनी रही है। इसका कारण यह है कि विदेशी वित्तपोषण का प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, नीति-निर्माण, सामाजिक गतिविधियों, धार्मिक संस्थाओं, शैक्षणिक अनुसंधान और जनमत निर्माण से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए यह आवश्यक है कि वह यह सुनिश्चित करे कि विदेश से प्राप्त धन का उपयोग कानूनसम्मत, पारदर्शी और घोषित उद्देश्यों के अनुरूप हो।
हालाँकि, किसी भी कानून की वास्तविक सफलता केवल उसके कठोर प्रावधानों से नहीं, बल्कि उसके संतुलित क्रियान्वयन से निर्धारित होती है। यदि नियम इतने जटिल हों कि ईमानदारी से कार्य करने वाले सामाजिक संगठन भी अनावश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझ जाएँ, तो कानून के उद्देश्य पर भी प्रश्न उठने लगते हैं। दूसरी ओर यदि निगरानी अत्यधिक शिथिल हो जाए, तो दुरुपयोग की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए आवश्यकता कठोरता और सुविधा के बीच संतुलन स्थापित करने की है।
इसी संदर्भ में एफसीआरए की समीक्षा के दौरान कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर गंभीर विचार किया जा सकता है। पहला, आवेदन, नवीनीकरण और वार्षिक प्रतिवेदन की पूरी प्रक्रिया को अधिक डिजिटल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जाए। दूसरा, छोटे और वास्तविक सामाजिक संगठनों तथा बड़े वित्तीय संसाधनों वाले संस्थानों के लिए जोखिम-आधारित निगरानी व्यवस्था विकसित की जा सकती है। तीसरा, यदि किसी संस्था के विरुद्ध कार्रवाई की जाती है तो उसे कारणों की स्पष्ट जानकारी, प्रभावी अपील और समयबद्ध सुनवाई का अवसर भी मिलना चाहिए। इससे कानून की विश्वसनीयता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत दोनों मजबूत होंगे।
भारत में हजारों स्वयंसेवी संस्थाएँ शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण, आदिवासी क्षेत्रों के विकास, आपदा राहत, पर्यावरण संरक्षण, दिव्यांग कल्याण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। ऐसी संस्थाओं के लिए पारदर्शी और पूर्वानुमेय नियामक व्यवस्था आवश्यक है। साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि विदेशी अंशदान के नाम पर किसी प्रकार के अवैध वित्तीय प्रवाह, धन शोधन या राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों की संभावना पर प्रभावी नियंत्रण बना रहे। यही लोकतांत्रिक शासन की जिम्मेदारी है।
संसदीय समितियों की उपयोगिता भी इसी कारण महत्वपूर्ण मानी जाती है। संसद में होने वाली खुली बहसों के अतिरिक्त समितियाँ अपेक्षाकृत विस्तार से विशेषज्ञों, अधिकारियों, विधि-विशेषज्ञों, नागरिक समाज और अन्य संबंधित पक्षों की राय सुन सकती हैं। इससे कानूनों का अधिक व्यावहारिक और संतुलित मूल्यांकन संभव होता है। किसी भी समिति की सफलता उसके अध्यक्ष या सदस्यों की व्यक्तिगत प्रशंसा से अधिक इस बात से आँकी जाती है कि उसकी सिफारिशें कितनी व्यावहारिक, संतुलित और राष्ट्रीय हित में उपयोगी सिद्ध होती हैं।
आज भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेजी से उभरती शक्ति है। ऐसे समय में देश को एक ऐसी नियामक व्यवस्था की आवश्यकता है जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी प्रोत्साहित करे और राष्ट्रीय हितों की रक्षा भी सुनिश्चित करे। विदेशी सहयोग का स्वागत हो, लेकिन उसकी प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी, उत्तरदायी और विधिसम्मत हो—यही किसी भी आधुनिक लोकतंत्र की अपेक्षा है।
एफसीआरए पर चल रहा विमर्श केवल एक कानून में संशोधन का प्रश्न नहीं है; यह इस व्यापक बहस का हिस्सा है कि भारत विकास, सामाजिक सहभागिता, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित करे। यदि इस समीक्षा से ऐसी व्यवस्था विकसित होती है जिसमें ईमानदार संस्थाओं को सुविधा मिले, पारदर्शिता बढ़े, तकनीक का प्रभावी उपयोग हो और दुरुपयोग पर कठोर नियंत्रण बना रहे, तो यह भारतीय लोकतंत्र और सुशासन—दोनों के लिए सकारात्मक कदम होगा।
अंततः किसी भी कानून का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि विश्वास स्थापित करना होना चाहिए। एफसीआरए भी तभी अधिक प्रभावी माना जाएगा जब वह एक ओर राष्ट्रीय हितों की दृढ़ रक्षा करे और दूसरी ओर जनहित में कार्य करने वाले वैध संगठनों के लिए स्पष्ट, सरल और पारदर्शी व्यवस्था उपलब्ध कराए। यही संतुलन लोकतांत्रिक शासन की पहचान है और यही संसदीय मंथन की वास्तविक सफलता भी होगी।
लेखक परिचय:
राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक धार्मिक सांस्कृतिक एवं समसामयिक विषयों पर स्वतंत्र शोध लेखक, समीक्षक, विचारक, सामाजिक चिंतक।




