आरक्षण पर राजनीति का विष और भारत को बाँटने की कोशिश : सामाजिक न्याय बनाम चुनावी ध्रुवीकरण की चुनौती

आचार्य अशोक चौधरी प्रियदर्शी
कटिहार, बिहार

भारत का संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी मार्गदर्शक है। इसी संविधान ने उन वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान किए, जो सदियों तक सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक दृष्टि से वंचित रहे। आरक्षण इसी संवैधानिक दर्शन का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसलिए यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि आरक्षण किसी राजनीतिक दल की कृपा नहीं है और न ही किसी सरकार की इच्छा से इसे समाप्त किया जा सकता है। यह संवैधानिक व्यवस्था है, जिसके संबंध में कोई भी मूलभूत परिवर्तन संविधान और न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में ही संभव है।

इसके बावजूद समय-समय पर देश में ऐसा वातावरण बनाया जाता है मानो आरक्षण किसी भी क्षण समाप्त होने वाला हो। चुनाव आते ही आरक्षण, जाति, सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक अन्याय जैसे विषय राजनीतिक बहस के केंद्र में आ जाते हैं। यह स्वाभाविक है कि लोकतंत्र में इन विषयों पर चर्चा हो, किंतु चिंता तब होती है जब चर्चा का उद्देश्य समाधान नहीं, बल्कि सामाजिक ध्रुवीकरण बन जाए।

भारत का सामाजिक इतिहास जटिल रहा है। जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएँ वास्तविक रही हैं, और इन्हें नकारना इतिहास के साथ अन्याय होगा। इसी कारण संविधान निर्माताओं ने सामाजिक न्याय को राष्ट्र निर्माण का आधार बनाया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी आरक्षण को सामाजिक समानता की दिशा में एक साधन के रूप में देखा था, न कि समाज को स्थायी रूप से विभाजित करने वाले उपकरण के रूप में। उनका उद्देश्य ऐसा भारत था जहाँ अंततः अवसर की समानता स्थापित हो और किसी नागरिक की पहचान उसकी जाति नहीं, उसकी क्षमता और नागरिकता बने।

दुर्भाग्य से समय के साथ आरक्षण का प्रश्न कई बार सामाजिक न्याय से अधिक राजनीतिक रणनीति का विषय बनता गया। किसी पक्ष द्वारा यह प्रचार किया जाता है कि आरक्षण समाप्त किया जा रहा है, तो दूसरा पक्ष यह वातावरण बनाता है कि आरक्षण व्यवस्था के कारण योग्यता समाप्त हो रही है। इन दोनों अतिवादी दृष्टिकोणों के बीच संवैधानिक तथ्य और संतुलित विमर्श अक्सर पीछे छूट जाते हैं।

वास्तविकता यह है कि आरक्षण की समीक्षा और आरक्षण की समाप्ति दोनों अलग-अलग बातें हैं। किसी भी सार्वजनिक नीति की समय-समय पर समीक्षा होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का सामान्य सिद्धांत है। समीक्षा का अर्थ यह देखना है कि नीति अपने मूल उद्देश्य को कितनी प्रभावी ढंग से पूरा कर रही है, उसका लाभ वास्तविक पात्रों तक पहुँच रहा है या नहीं, और क्या उसके क्रियान्वयन में सुधार की आवश्यकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि उस नीति को समाप्त किया जा रहा है।

यही अंतर अक्सर राजनीतिक नारों में धुंधला कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप समाज में भय, अविश्वास और टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन भय के वातावरण का निर्माण किसी भी समाज के लिए हितकारी नहीं हो सकता।

आरक्षण के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर अनेक महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़े वर्गों के अधिकारों से लेकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण तक, न्यायपालिका ने संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए विभिन्न पहलुओं पर विचार किया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत में आरक्षण का प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक और न्यायिक विमर्श का भी विषय है।

आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान इस बात का उदाहरण है कि सामाजिक न्याय की अवधारणा समय के साथ नए आयाम भी ग्रहण कर सकती है। इससे यह संदेश भी मिलता है कि अवसर की समानता सुनिश्चित करने के लिए संविधान के दायरे में रहते हुए नए उपायों पर विचार संभव है।

इसके साथ ही यह भी स्वीकार करना होगा कि भारत के विकास का भविष्य केवल आरक्षण की बहस से तय नहीं होगा। आज देश के करोड़ों युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार, उद्यमिता और आर्थिक अवसरों की है। यदि पूरा राजनीतिक विमर्श केवल जातीय पहचान तक सीमित हो जाए और विकास, उद्योग, कृषि, विज्ञान तथा नवाचार जैसे विषय पीछे छूट जाएँ, तो इसका सबसे अधिक नुकसान युवा पीढ़ी को होगा।

आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बना रहा है। डिजिटल प्रौद्योगिकी, आधारभूत संरचना, अंतरिक्ष, रक्षा, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में नई संभावनाएँ विकसित हो रही हैं। ऐसे समय में सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता आर्थिक प्रगति की अनिवार्य शर्त हैं। यदि समाज लगातार जातीय तनाव में उलझा रहेगा, तो विकास की गति भी प्रभावित होगी।
आरक्षण के प्रश्न पर एक और महत्वपूर्ण पक्ष है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को सामाजिक न्याय का माध्यम बनाया था, स्थायी राजनीतिक ध्रुवीकरण का आधार नहीं। इसका मूल उद्देश्य उन वर्गों को अवसर उपलब्ध कराना था, जो ऐतिहासिक कारणों से शिक्षा, रोजगार और प्रतिनिधित्व में पीछे रह गए थे। इसलिए आरक्षण की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि वह समाज में अवसर की समानता, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता को कितना मजबूत करता है।

लोकतंत्र में किसी भी नीति पर विमर्श होना स्वाभाविक है। यह भी उतना ही स्वाभाविक है कि समय-समय पर उसके क्रियान्वयन की समीक्षा हो। लेकिन समीक्षा और समाप्ति के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। यदि यह देखा जाए कि आरक्षण का लाभ सबसे अधिक वंचित व्यक्ति तक पहुँच रहा है या नहीं, यदि यह विचार किया जाए कि शिक्षा की गुणवत्ता कैसे बढ़े, यदि यह चर्चा हो कि सरकारी नौकरियों के साथ निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर कैसे बढ़ें, तो यह लोकतांत्रिक विमर्श है। परंतु यदि किसी भी चर्चा को यह कहकर प्रस्तुत किया जाए कि संविधान खतरे में है या आरक्षण समाप्त होने वाला है, तो इससे समाज में अनावश्यक भय और भ्रम पैदा होता है।

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी कमजोर नहीं है कि कोई सरकार अकेले आरक्षण व्यवस्था को समाप्त कर दे। संविधान के मूल ढाँचे, संसद की भूमिका और न्यायपालिका की संवैधानिक समीक्षा जैसी व्यवस्थाएँ इस बात का आश्वासन देती हैं कि ऐसे किसी भी बड़े परिवर्तन की संवैधानिक कसौटी पर जाँच होगी। इसलिए सार्वजनिक विमर्श का आधार तथ्य होने चाहिए, आशंकाएँ नहीं।

इसी संदर्भ में विश्वविद्यालयों में भेदभाव-रोधी नियमों को लेकर हुए विवाद से भी एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है। उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और भेदभाव-निवारण के उद्देश्य से बनाए गए नए नियमों पर विभिन्न पक्षों ने अलग-अलग मत व्यक्त किए। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा और न्यायालय ने अंतरिम स्तर पर पुराने नियमों को लागू रखने का निर्देश दिया, जबकि केंद्र सरकार ने बाद में नियमों पर पुनर्विचार की बात कही। इससे यह स्पष्ट होता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून और नीतियाँ न्यायिक समीक्षा तथा संस्थागत विमर्श की प्रक्रिया से गुजरती हैं। ऐसे विषयों को अंतिम और अपरिवर्तनीय निर्णय के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

आज भारत जिस आर्थिक और वैश्विक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, उसमें सबसे बड़ी आवश्यकता सामाजिक स्थिरता की है। कोई भी निवेशक, उद्योग, शैक्षणिक संस्थान या उद्यमी ऐसे समाज में दीर्घकालिक निवेश करना पसंद करता है जहाँ सामाजिक विश्वास और स्थिरता हो। यदि सार्वजनिक जीवन में निरंतर जातीय तनाव का वातावरण बनेगा, तो उसका प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अर्थव्यवस्था, शिक्षा और सामाजिक विकास पर भी पड़ेगा।

यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत की विविधता उसकी शक्ति है, कमजोरी नहीं। विभिन्न जातियाँ, भाषाएँ, संस्कृतियाँ और परंपराएँ मिलकर भारतीय समाज का निर्माण करती हैं। यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इस विविधता को परस्पर अविश्वास में बदल दे, तो उसका नुकसान अंततः पूरे राष्ट्र को उठाना पड़ेगा। इसलिए प्रत्येक राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी है कि वह सामाजिक न्याय के प्रश्न को संवेदनशीलता और संयम के साथ उठाए।

यह कहना भी उचित नहीं होगा कि सामाजिक भेदभाव पूरी तरह समाप्त हो चुका है। देश के अनेक हिस्सों में आज भी जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता की घटनाएँ सामने आती हैं, जिनसे कठोरता से निपटना आवश्यक है। दूसरी ओर यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी एक घटना को पूरे समाज की सामूहिक मानसिकता का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत न किया जाए। अपराधी का दंड निश्चित होना चाहिए, लेकिन पूरे समाज का सामूहिक अभियोजन लोकतांत्रिक न्याय की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

वास्तविक सामाजिक न्याय केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है। गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, सस्ती और सुलभ उच्च शिक्षा, कौशल विकास, उद्यमिता, कृषि सुधार, औद्योगिक विकास, महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ और समान आर्थिक अवसर भी सामाजिक न्याय के ही अंग हैं। यदि इन क्षेत्रों में पर्याप्त प्रगति नहीं होगी, तो केवल आरक्षण की बहस से व्यापक सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं होगा।

आज भारत के युवा की सबसे बड़ी आकांक्षा सम्मानजनक शिक्षा, रोजगार और बेहतर भविष्य है। वह यह भी चाहता है कि उसकी पहचान उसकी योग्यता, परिश्रम और उपलब्धियों से बने। इसलिए राजनीतिक विमर्श को केवल जातीय समीकरणों तक सीमित रखने के बजाय अवसरों के विस्तार पर केंद्रित होना चाहिए। जितने अधिक रोजगार, उद्योग और उद्यम के अवसर बढ़ेंगे, सामाजिक तनाव उतना ही कम होगा और प्रतिस्पर्धा अधिक सकारात्मक दिशा में जाएगी।

भारत का संविधान हमें समान नागरिकता, समान गरिमा और समान अवसर की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाता है। आरक्षण उसी यात्रा का एक महत्वपूर्ण साधन है, लेकिन उसका उद्देश्य समाज को स्थायी रूप से विभाजित करना नहीं, बल्कि समान अवसरों वाला समाज बनाना है। इसलिए आरक्षण पर कोई भी बहस संविधान की भावना, न्यायपालिका के मार्गदर्शन और सामाजिक समरसता को ध्यान में रखकर ही होनी चाहिए।

अंततः भारत को यह निर्णय करना होगा कि वह अपनी राजनीतिक ऊर्जा को अतीत के विभाजनों में खर्च करेगा या भविष्य के निर्माण में लगाएगा। यदि हमारा लक्ष्य विकसित भारत है, तो सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता दोनों को साथ लेकर चलना होगा। न किसी वर्ग के अधिकारों की उपेक्षा हो, न किसी वर्ग के मन में अनावश्यक भय उत्पन्न किया जाए। लोकतंत्र की सफलता इसी संतुलन में निहित है।

आज आवश्यकता यह नहीं कि समाज को अगड़ा-पिछड़ा, सवर्ण-दलित या अन्य पहचान-आधारित खाँचों में बाँटकर देखा जाए। आवश्यकता यह है कि प्रत्येक नागरिक को संविधान पर विश्वास हो, न्यायपालिका पर भरोसा हो और यह विश्वास हो कि भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएँ उसके अधिकारों की रक्षा करने में सक्षम हैं।

यही सामाजिक न्याय की वास्तविक भावना है।

यही संविधान की आत्मा है।

और यही विकसित, समरस और आत्मविश्वासी भारत की आधारशिला भी है।

लेखक परिचय:

राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं समसामयिक विषयों पर स्वतंत्र शोध लेखक, समीक्षक, विचारक, सामाजिक चिंतक।

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