विचारधारा की प्रयोगशाला से उद्योग-विहीन बंगाल तक : उद्योग, निवेश और टकराव की राजनीति का लंबा इतिहास

आचार्य अशोक चौधरी ‘प्रियदर्शी’
कटिहार, बिहार
पश्चिम बंगाल कभी भारत के औद्योगिक विकास का अग्रदूत माना जाता था। कोलकाता केवल एक महानगर नहीं, बल्कि देश की आर्थिक धुरी था। जूट उद्योग, इंजीनियरिंग, भारी मशीन निर्माण, बंदरगाह, चाय व्यापार, कोयला, रेल कारखाने, वित्तीय संस्थान और व्यापारिक प्रतिष्ठानों ने बंगाल को औद्योगिक शक्ति का प्रतीक बना दिया था। स्वतंत्रता के बाद भी यह अपेक्षा थी कि पश्चिम बंगाल देश के औद्योगिक विकास का नेतृत्व करेगा। किंतु समय के साथ स्थिति बदलती गई। अनेक उद्योग बंद हुए, अनेक नए निवेश दूसरे राज्यों की ओर चले गए और बंगाल की औद्योगिक पहचान धीरे-धीरे कमजोर पड़ती गई। यह परिवर्तन किसी एक घटना या एक सरकार का परिणाम नहीं था, बल्कि अनेक आर्थिक, राजनीतिक और प्रशासनिक कारणों का संयुक्त प्रभाव था। फिर भी इस पूरे दौर में राज्य की राजनीतिक संस्कृति, विशेषकर उद्योग और पूंजी के प्रति दृष्टिकोण, सबसे अधिक चर्चा का विषय रहा।
सन् 1967 के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया दौर प्रारंभ हुआ। संयुक्त मोर्चा सरकारों के समय से ही श्रमिक आंदोलनों, ट्रेड यूनियन राजनीति और वैचारिक संघर्ष का प्रभाव बढ़ने लगा। बाद में 1977 में वाम मोर्चा सत्ता में आया और तीन दशकों से अधिक समय तक शासन किया। इस अवधि में भूमि सुधार और पंचायत व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य हुए, जिनकी प्रशंसा अनेक अध्ययनों में भी की गई है। किंतु दूसरी ओर उद्योग, निवेश और रोजगार के क्षेत्र में राज्य की छवि को लेकर गंभीर प्रश्न भी उठे।
राजनीतिक विश्लेषकों और अर्थशास्त्रियों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि उस दौर में उद्योगपतियों के प्रति अविश्वास का वातावरण विकसित हुआ। श्रमिक अधिकारों की रक्षा लोकतंत्र का अनिवार्य तत्व है, किंतु जब श्रमिक आंदोलन और ट्रेड यूनियन राजनीति उत्पादन तथा औद्योगिक स्थिरता के साथ संतुलन खो बैठती है, तब उसका प्रभाव निवेश पर पड़ना स्वाभाविक है। अनेक उद्योगों में बार-बार हड़ताल, तालाबंदी, कामबंदी और राजनीतिक हस्तक्षेप की घटनाओं ने यह धारणा बनाई कि राज्य में औद्योगिक गतिविधियों के लिए अनुकूल वातावरण नहीं है। यही वह बिंदु था जहाँ मजदूर और उद्योगपति के बीच सहयोग की जगह टकराव की राजनीति अधिक दिखाई देने लगी।
मजदूर किसी भी उद्योग की रीढ़ होते हैं। उनके अधिकारों की रक्षा, उचित वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल और सामाजिक सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। लेकिन उद्योग भी केवल पूंजीपति का नहीं होता; उससे हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी होती है। यदि किसी कारखाने का उत्पादन लगातार बाधित होता है, यदि हर विवाद राजनीतिक संघर्ष का रूप ले लेता है, यदि निवेशक को भविष्य असुरक्षित दिखाई देता है, तो वह नई पूंजी लगाने से पहले कई बार सोचता है। अंततः इसका सबसे बड़ा नुकसान स्वयं मजदूरों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ता है।
पश्चिम बंगाल के संदर्भ में यह तर्क लंबे समय से दिया जाता रहा है कि वामपंथी राजनीति के एक हिस्से ने उद्योगपति को विकास के भागीदार के बजाय वर्गीय प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। इस दृष्टिकोण से असहमत लोग यह कहते हैं कि उद्योगों के पलायन के लिए केवल वामपंथी नीतियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता; केंद्र की औद्योगिक नीतियाँ, मालभाड़ा समानीकरण नीति, लाइसेंस-परमिट व्यवस्था, आधारभूत ढाँचे की चुनौतियाँ और वैश्विक आर्थिक परिवर्तन भी महत्वपूर्ण कारण थे। वस्तुतः इतिहास का संतुलित अध्ययन यही संकेत देता है कि अनेक कारण एक साथ कार्य कर रहे थे। किंतु यह भी उतना ही स्पष्ट है कि निवेशकों का विश्वास किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूंजी होता है, और यदि वह कमजोर पड़ता है तो उसका असर दीर्घकाल तक रहता है।
समय के साथ वाम मोर्चा सरकार ने भी इस चुनौती को महसूस किया। बाद के वर्षों में उद्योगों को आकर्षित करने के प्रयास किए गए। बुद्धदेव भट्टाचार्य के कार्यकाल में औद्योगीकरण की नई पहल इसी बदली हुई सोच का परिणाम थी। इसका अर्थ यह भी था कि स्वयं शासन को यह अनुभव हुआ कि केवल वैचारिक नारों से रोजगार सृजित नहीं किए जा सकते। उद्योग, तकनीक, पूंजी और निवेश किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं।
किन्तु जब तक यह परिवर्तन आया, तब तक पश्चिम बंगाल की औद्योगिक छवि काफी प्रभावित हो चुकी थी। निवेशक केवल नीतियाँ नहीं देखते, वे वातावरण भी देखते हैं। उन्हें यह विश्वास चाहिए कि प्रशासन निष्पक्ष होगा, श्रम संबंध पूर्वानुमेय होंगे, कानून-व्यवस्था सुदृढ़ होगी और विवादों का समाधान संस्थागत ढंग से होगा। यदि यह भरोसा कमजोर पड़ जाए, तो उद्योग अन्य विकल्पों की ओर बढ़ने लगते हैं।
सिंगूर और नंदीग्राम जैसे विवादों ने भी पश्चिम बंगाल की औद्योगिक बहस को राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचा दिया। इन घटनाओं ने भूमि अधिग्रहण, किसानों के अधिकार, औद्योगीकरण और राजनीतिक आंदोलन—इन सभी विषयों को एक साथ जोड़ दिया। एक पक्ष ने इसे किसानों के अधिकारों की रक्षा बताया, जबकि दूसरे पक्ष ने इसे राज्य के औद्योगिक भविष्य के लिए बड़ा झटका माना। यह स्पष्ट है कि इन घटनाओं ने निवेशकों के मन में प्रश्न अवश्य खड़े किए।
इसके बाद तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई। उससे अपेक्षा थी कि वह औद्योगिक वातावरण को नई दिशा देगी और निवेशकों का विश्वास पुनः स्थापित करेगी। राज्य सरकार ने विभिन्न निवेश सम्मेलनों और औद्योगिक परियोजनाओं की घोषणाएँ भी कीं। साथ ही, आलोचकों ने यह आरोप भी लगाया कि उद्योग और व्यापार के लिए आवश्यक प्रशासनिक पारदर्शिता तथा निवेश-अनुकूल वातावरण अपेक्षित स्तर तक विकसित नहीं हो सका। समय-समय पर स्थानीय स्तर पर राजनीतिक हस्तक्षेप, अवैध वसूली (जिसे कई राजनीतिक आलोचक “टोला बाज़ी” कहते हैं), भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था से जुड़े प्रश्न सार्वजनिक बहस का हिस्सा बने। दूसरी ओर राज्य सरकार इन आरोपों को अस्वीकार करती रही है और अपने शासन में हुए निवेश, बुनियादी ढाँचे के विकास तथा सामाजिक योजनाओं को प्रमुख उपलब्धि बताती है। लोकतांत्रिक विमर्श में दोनों पक्षों के दावों का मूल्यांकन तथ्यों और उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।
किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था भय और अविश्वास पर नहीं चल सकती। उद्योगपति को लाभ चाहिए, मजदूर को सम्मानजनक जीवन चाहिए और सरकार को रोजगार एवं राजस्व चाहिए। यदि इन तीनों के बीच संतुलन बनता है, तभी औद्योगिक विकास संभव है। यदि किसी एक पक्ष को स्थायी शत्रु मान लिया जाए, तो अंततः हानि पूरे समाज की होती है।
बंगाल का अनुभव यह सिखाता है कि उद्योग और श्रमिक को आमने-सामने खड़ा करने की राजनीति दीर्घकाल में किसी के हित में नहीं होती। श्रमिक अधिकार और निवेश सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक होने चाहिए। जिस राज्य में श्रमिक सुरक्षित हों और निवेशक भी आश्वस्त हों, वहीं टिकाऊ औद्योगिक विकास संभव है।
आज भारत “मेक इन इंडिया”, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और विनिर्माण विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में पश्चिम बंगाल जैसी भौगोलिक और मानवीय क्षमता वाले राज्य के पास भी नए अवसर हैं। कोलकाता बंदरगाह, पूर्वोत्तर और दक्षिण-पूर्व एशिया से संपर्क, शिक्षित मानव संसाधन तथा विशाल घरेलू बाजार जैसे अनेक लाभ आज भी उसके पास हैं। आवश्यकता ऐसी नीतियों की है जो उद्योग और श्रम के बीच विश्वास का पुल बनाएँ।
राजनीतिक विचारधाराएँ लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, किंतु आर्थिक नीति का अंतिम उद्देश्य नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार होना चाहिए। यदि किसी विचारधारा के कारण निवेश रुकता है, रोजगार घटता है और युवा राज्य छोड़ने को विवश होते हैं, तो उस नीति की समीक्षा आवश्यक है। उसी प्रकार यदि विकास के नाम पर श्रमिकों या किसानों के अधिकारों की अनदेखी होती है, तो वह भी स्वीकार्य नहीं हो सकती।
पश्चिम बंगाल की औद्योगिक यात्रा इसलिए एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सबक है। यह बताती है कि उद्योग केवल पूंजी का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास, राजनीतिक स्थिरता, प्रशासनिक पारदर्शिता और संतुलित श्रम संबंधों का परिणाम है। राज्य तभी आगे बढ़ सकता है जब सरकार, उद्योग और श्रमिक—तीनों एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि विकास के साझेदार मानें।
इतिहास को दोष देने से भविष्य नहीं बदलता। भविष्य तब बदलता है जब अतीत की भूलों से सीख लेकर नई नीतियाँ बनाई जाती हैं। पश्चिम बंगाल के सामने आज भी अवसर समाप्त नहीं हुए हैं। यदि निवेश-अनुकूल वातावरण, पारदर्शी प्रशासन, प्रभावी कानून-व्यवस्था, श्रमिक अधिकारों की रक्षा और उद्योगों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को साथ लेकर आगे बढ़ा जाए, तो औद्योगिक पुनर्जागरण की संभावना आज भी मौजूद है।
लेखक परिचय:
राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक धार्मिक सांस्कृतिक एवं समसामयिक विषयों पर स्वतंत्र शोध लेखक समीक्षक विचारक सामाजिक चिंतक




